अररिया हत्याकांड : मां की क्रूरता, न्याय की जीत और महिलाओं पर फांसी के कानूनी पहलू

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By Anubhav Ranjan

बिहार के अररिया जिले से निकली एक ऐसी घटना ने न केवल स्थानीय समुदाय को हिला दिया, बल्कि पूरे देश को सोचने पर मजबूर कर दिया। एक मां ने अपनी 10 साल की मासूम बेटी की बेरहमी से हत्या कर दी, और अदालत ने आरोपी को फांसी की सजा सुनाई। यह केस कानूनी सख्ती का प्रतीक है, जो सामाजिक मूल्यों को चुनौती देता है। आइए, इस घटना के हर कोण को गहराई से देखें, साथ ही भारतीय संविधान और बिहार के इतिहास में महिलाओं को फांसी के प्रावधानों पर नजर डालें।

सब कुछ शुरू हुआ 10 जुलाई 2023 को नरपतगंज थाना क्षेत्र के एक साधारण गांव में। आरोपी पूनम देवी, 35 वर्ष की गृहिणी, का पारिवारिक जीवन बाहर से शांतिपूर्ण लगता था। पति पंजाब में मजदूरी कर रहा था और जल्द घर लौटने वाला था। लेकिन अंदरूनी सच्चाई भयावह थी। पूनम का एक अवैध संबंध चल रहा था, जिसे उसकी बेटी ने गलती से देख लिया। बच्ची ने मां को किसी अन्य व्यक्ति के साथ निजी पल में पकड़ लिया। पूनम को भय हुआ कि बेटी पिता को सच्चाई बता देगी, जिससे उसका जीवन उजड़ जाएगा। डर ने उसे पागल बना दिया।

उसने एक शैतानी साजिश रची। भोजन में घरेलू कीटनाशक मिलाकर बेटी को जहर दे दिया। कुछ ही पलों में बच्ची बेहोश हो गई। फिर पूनम ने चाकू से उसके पेट, गले और सिर पर कई घातक वार किए। मासूम की सांसें थम गईं। हत्या छिपाने के लिए शव को कमरे में मक्के के ढेर के नीचे दफना दिया। पूनम ने चालाकी दिखाई – शोर मचाकर अपहरण का ढोंग रचा। “मेरी बेटी गायब हो गई!” गांववासी जुटे, रिश्तेदार आए, पुलिस को खबर की। वह खुद उदास नाटक कर रही थी। लेकिन झूठ लंबा नहीं चला।

अगले दिन तलाशी के दौरान पूनम ने ही शव “खोज” लिया। गांव सन्नाटे में डूब गया। पोस्टमॉर्टम ने राज खोला – चाकू के गहरे घाव और पेट में जहर। विसरा सैंपल भागलपुर लैब भेजा गया, जहां कीटनाशक की पुष्टि हुई। पुलिस ने पूनम को घेरा; पूछताछ में वह टूट पड़ी और कबूल लिया। 11 जुलाई 2023 को नरपतगंज थाने में FIR (कांड 380/2023) दर्ज। जांच तेज रही – गवाह, चाकू, जहर सैंपल, परिवार के बयान सब इकट्ठे। 2024 में चार्जशीट दाखिल। अररिया सिविल कोर्ट में एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज चतुर्थ रवि कुमार ने स्पीडी ट्रायल चलाया। आरोपी ने बचाव किया, लेकिन सबूतों ने सब साफ कर दिया।

28 नवंबर 2025 को फैसला आया। जज बोले, “आरोपी के गले में फंदा डालकर लटकाओ, जब तक मौत न हो।” IPC धारा 302 (हत्या) के तहत फांसी – “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” केस में। अन्य सजाएं: धारा 328 (जहर) में 7 साल + 50,000 जुर्माना; धारा 201/120B (साक्ष्य नष्ट/षड्यंत्र) में 5 साल + 10,000 जुर्माना। कुल 60,000 जुर्माना; न चुकाने पर 18 महीने अतिरिक्त। सहायक लोक अभियोजक प्रभा कुमारी ने इसे न्याय की विजय कहा, जो मां की क्रूरता पर चेतावनी है।

यह हत्या मात्र नहीं, विश्वासघात है। मां, जो पालक है, वही विध्वंसक बनी। गांव में शोक है, बच्ची की स्मृतियां जीवित। पिता का दर्द सोचकर रूह कांपती है। बिहार पुलिस-कोर्ट की सराहना हो रही – 2 साल में न्याय। लेकिन समाज क्या करेगा? जागरूकता, काउंसलिंग, महिला सशक्तिकरण से ही ऐसे अपराध थमेंगे। यह सजा आरोपी को दंडित करेगी, अपराधियों को डराएगी।

अब सवाल उठता है – भारतीय संविधान महिलाओं को फांसी पर क्या कहता है? कोई विशेष छूट नहीं। अनुच्छेद 14 (समानता) सभी को समान न्याय देता – लिंग भेदभाव निषिद्ध। फांसी IPC 302 जैसे अपराधों में, CrPC 354(5) के तहत “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” में। जज तय करते, सुप्रीम कोर्ट कन्फर्म। महिलाओं के लिए अलग नियम न; सिर्फ गर्भावस्था में CrPC 416 से आजीवन कारावास। जेल मैनुअल में फांसी निजी, सुबह 8 बजे। राष्ट्रपति माफी (अनुच्छेद 72) दे सकते, लेकिन लिंग आधारित नहीं। सुप्रीम कोर्ट नैतिक-सामाजिक प्रभाव देखता, न कि लिंग। उदाहरण: शीना बोरा केस में ताहिरा को सजा (अपील पेंडिंग); बीकीराम को 1972 में फांसी। महिलाओं में फांसी 5-10% ही।

बिहार में? स्वतंत्र भारत (1947-2025) में कोई महिला फांसी नहीं। कुल फांसी ~20-25 (पुरुष प्रधान)। पूनम देवी का केस सजा देगा, लेकिन अपील से शायद कम्युट हो। बिहार जेल रिकॉर्ड्स (पटना/भागलपुर) खाली। ब्रिटिश काल में संभव, लेकिन आधिकारिक न। कारण: गर्भावस्था कम्युट, अपील में मानवीय फैक्टर। समाजिक दबाव से सजाएं बदल जातीं।

यह केस न्याय व्यवस्था की ताकत दिखाता। अपराध रोकने के लिए शिक्षा-जागरूकता जरूरी। कानून हर निर्दोष की ढाल बनेगा।

Prashant Kumar ‘Pranay’  Political Analyst Ambika Ujala