जातिगत जश्न : कास्ट और क्लास का अंतर।

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By Anubhav Ranjan

समाज में एक चलन है, विशेषकर बिहार में कि आपकी जाति का कोई व्यक्ति किसी बड़े पद पर आसीन होता है तो गांव-घर-समाज में लोग जश्न मनाने लगते हैं, आपस में बधाइयां और मिठाइयां बांटते लगते हैं, इसलिए नहीं कि जीवन में किसी ने कुछ अच्छा मकाम हासिल किया, पर इसलिए कि ऐसा मकाम हासिल करने वाला व्यक्ति आपकी अपनी जाति से ताल्लुकात रखता है। भले ही उस सफल व्यक्ति का सामाजिक संबंध और योगदान नगण्य रहा हो, पर लोग फिर भी जाति के नाम पर लहालोट हो जाते हैं। और ऐसे लहालोट होने वाले अधिकांशतः सामान्य या गरीब परिवार के लोग ही होते हैं। संभ्रांत परिवार सामान्यतः किसी के लिए लहालोट नहीं होते।

मेरी जाति का फलना व्यक्ति आईपीएस बना, मेरी जाति का ढेकना व्यक्ति आईएएस बना, मेरी जाति का फलना व्यक्ति एसपी बना, मेरी जाति का ढेकना व्यक्ति डीजीपी बना, मेरी जाति का फलना व्यक्ति गृह मंत्री बना, तो मेरी का ढेकना व्यक्ति स्वास्थ्य मंत्री बना, मेरी जाति का फलना व्यक्ति एम्स का डायरेक्टर बना तो मेरी जाति का ढेकना व्यक्ति आईआईटी का डायरेक्टर बना। मेरी जाति का फलना व्यक्ति गवर्नर बना तो मेरी जाति का ढेकना व्यक्ति चीफ सेक्रेटरी बना, सो ऑन एंड सो फोर्थ।

मैं पूछता हूं बना तो क्या? बना तो बना। आपको रत्ती भर भी फायदा मिलने वाला है क्या? बिना मतलब का जाति के नाम पर लोग लहालोट हुए जाते हैं। माइंडलेसली एंड सेंसलेसली। मैं बिल्कुल लहालोट नहीं होता। कभी नहीं। मेरी जाति का कोई एसपी बने, आईजी बने, डीजीपी बने, चीफ सेक्रेटरी बने या गवर्नर बने, मुझे कोई खुशी नहीं होती। प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति या चीफ जस्टिस भी बन जाए तो मुझे खुशी नहीं होगी। मैं सामान्य भाव में रहना पसंद करूंगा। हां, किसी से मेरा व्यक्तिगत संबंध हो तो वो बात अलग। अन्यथा मेरी जाति से ताल्लुकात रखने की वजह से मैं खुश होऊं, ऐसा मैं जरूरी नहीं समझता। यदि व्यक्ति संच में अच्छा है, तो वह किसी भी जाति-धर्म का हो, उसकी सफलता पर सबको खुश होना चाहिए।

सामाजिक सच्चाई को समझना चाहिए। किसी इल्यूजन में नहीं रहना चाहिए। अगर आप किसी मध्यमवर्गीय या गरीब परिवार से ताल्लुकात रखते हैं, और आपकी जाति का कोई व्यक्ति किसी बड़े पद पर आसीन है, तो वह आपकी जाति देखकर और जानकर आपकी मदद कर देगा, यह बिल्कुल हास्यास्पद बात है। अव्व्ल तो यह कि आप किसी ऐसे बड़े पद पर आसीन व्यक्ति को, जिनसे आपको कुछ काम है, अपनी जाति बता ही नहीं पाएंगे (अगर आपके सरनेम से वह नहीं झलकता है) वो आपको अपने सामने कभी इतना कंफर्टेबल होने ही नहीं देगा कि आप ये सब बातें कर सकें, डायरेक्टली या इशारा में भी। फिर भी यदि आप चाहते हैं कि अमुक बड़ा व्यक्ति आपकी जाति जान जाए तो उसके लिए आपके पास एक “सर्टेन डिग्री ऑफ इंटेलिजेंस” होना अनिवार्य है, ताकि बातों को आप घुमा-फिरा कर स्मार्ट तरीके से रख सकें। उसके बाद भी आपका काम हो जाए, इसकी कोई गारंटी नहीं है।

इसकी कई वजहें हैं जिसे समझना जरूरी है। सबसे पहली वजह तो यह है कि आपकी और किसी बड़े व्यक्ति की “जाति” एक हो सकती है मगर “क्लास” नहीं। गरीब और मध्यमवर्गीय लोगों के लिए जाति बड़ी चीज होती है,परन्तु तथाकथित बड़े लोगों के लिए “क्लास”। आप उसको अपनी “कास्ट” का मानते रहिए, वो आपको अपनी “क्लास” का कभी मानेगा ही नहीं।

इसे ऐसे समझिए, किसी ब्राह्मण आईएएस अपने कार्यालय में पदस्थापित किसी ब्राह्मण सिक्योरिटी गार्ड को ऊंचे नजर से, समान भाव से, समान इज्जत से देखेगा, जैसे वह अपने किसी ब्राह्मण आईएएस कलीग को देखता होगा? कभी नहीं। हो सकता है कि अगर अधिकारी अच्छा हो तो व्यावहारिकता बनाए रखने के लिए ऊपर से वह विनम्रता का स्वांग भी रचे, पर अंदर से वैसी इज्जत वह उसे कभी नहीं देगा। क्योंकि सिक्योरिटी गार्ड भले ही उसकी कास्ट का हो, पर क्लास का नहीं है। कोई भूमिहार आईपीएस किसी सामान्य भूमिहार सिपाही या दारोगा के साथ बराबरी का व्यवहार करेगा? कोई राजपूत सेक्रेटरी अपने अधीनस्थ किसी कर्मचारी के साथ समानता का व्यवहार करेगा? अगर कोई करता है तो उसे मैं अपवाद ही नहीं, बल्कि “भयानक अपवाद” की श्रेणी में रखूंगा। करीब-करीब सारे जातियों के लिए यही सत्य है।

दूसरी वजह यह है कि ये सारे तथाकथित बड़े लोगों में, यदि सिर्फ पॉलिटिकल क्लास को छोड़ दिया जाए तो, जो अधिकारी वर्ग है, वह सामान्यतः बचपन से ही अपने गांव-समाज से कटा हुआ होता है। उसकी शिक्षा-दीक्षा और अपब्रिंगिंग ऐसी होती है, कि वह अपने गांव-समाज से उस रूप में बिल्कुल जुड़ा हुआ नहीं होता है, जिस रूप में उसकी जाति के लोग उसके लिए महसूस करते हैं।

इसे ऐसे समझिए। बिहार कैडर के जितने भी आइएएस या आईपीएस हैं, उनमें से कितने लोगों ने बिहार में रहकर शिक्षा-दीक्षा प्राप्त की है, थोड़ा पता कर लीजिए, तो आप वास्तविकता समझ जायेंगे। ज्यादातर लोगों की शिक्षा-दीक्षा बाहर हुई है। कुछ लोगों की शिक्षा-दीक्षा अगर दसवीं-बारहवीं तक यहां हुई भी होगी, तो भी चांस है कि बिहार के किसी एलीट स्कूल से हुई होगी, जहां उनका सर्किल और वातावरण ग्रामीण न होकर विशुद्ध एलीट होगा। दोस्त-यार भी वैसे ही एलीट बैकग्राउंड के होंगे। वह शायद ही कभी आम ग्रामीण बच्चों के साथ, आम गंवई परिवेश में घुल-मिलकर रहा होगा, जहां जातिय गर्व का माहौल होता है या ऐसी बातें होती हैं। ऐसे बच्चे कभी-कभार छुट्टी में अपने गांव जाते भी हैं तो उनके गार्जियन और परिवार का फुल फोकस होता है कि मेरा बच्चा आम ग्रामीण बच्चों के साथ मेलमिलाप न बढ़ाने पाए क्योंकि मेरे बच्चे अच्छे स्कूलों में पढ़ रहे हैं और ग्रामीण बच्चों के साथ मेलमिलाप बढ़ाएंगे तो बिगड़ जायेंगे।

तो आप कैसे उम्मीद करते हैं कि यही बच्चा जब आगे चलकर आईएएस या आईपीएस बनेगा तो वह अपने गांव से, अपने समाज से या अपनी जाति से एकाबैक भावनात्मक जुड़ाव महसूस करने लगेगा? वह कभी नहीं करेगा। अगर कोई करता है तो वह “भयानक अपवाद” है, और उसकी परिस्थितियां बिल्कुल भिन्न रही होंगी। तो आपके गांव का, आपके समाज का आपकी जाति का कोई व्यक्ति किसी ऊंचे पद पर आसीन होता है तो आप ढोल-नगाड़ा पीटीए, जातिगत आधार पर जश्न मनाइए, वह व्यक्ति इसे एंजॉय भी करेगा, पर आपको समान भाव से, समान आदर से कभी नहीं देखेगा, क्योंकि उसके अनुसार उसका क्लास अलग है, और आपका अलग।

तीसरी वजह यह है कि किसी बड़े पद पर पहुंचने के बाद व्यक्ति वैसे नहीं सोचता जैसे समाज के आम लोग सोचते हैं। वह किसी सोशल आइडेंटिटी के स्तर पर समाज से वैसा जुड़ाव महसूस नहीं करता है जैसे समाज के लोग उससे करते हैं। किसी ऊंचे पद पर जाने के बाद उसकी जीवनदृष्टि, उसका वर्ल्डवीव पूर्णतया बदल जाता है, या ऐसा कह लीजिए आरम्भ से ही ऐसे बदलाव का अंश पनपता रहता है, जो बाद में सॉलिडिफाई हो जाता है। क्योंकि उसकी शिक्षा-दीक्षा और अपब्रिंगिंग वैसी होती है। शिक्षा आपको व्यक्तिगत स्तर पर ऊंचा उठाता है पर वह आपको समाज से काटता भी है। वह आपमें अहंकार भी भरता है। एगोटिस्टिकल भी बनाता है। हरेक स्थिति में यही बात हो, ऐसा जरूरी नहीं है, सुखद अपवाद भी हो सकते हैं, होते ही हैं, पर सामान्यतः संच यही होता है जो मैने ऊपर कहा।

पॉलिटिकल क्लास को मैने अधिकारी वर्ग से जानबूझकर अलग इसलिए रखा, क्योंकि पॉलिटिकल क्लास के लोग समाज के बीच से चुनकर पावर में आते हैं तो समाज के प्रति उनके मन में एक निश्चित उत्तरदायित्व का बोध भी होता है, उनको जनता को जवाब देना होता है, चूंकि जातिगत आधार पर वोट मिलता है तो जातिगत आधार पर लोगों की बातें भी सुनी जाती हैं, इसलिए एक अलग हाइयर क्लास होते हुए भी इनलोगों का सामान्यतः जनता से जुड़ाव होता है। पर अधिकारी वर्ग ऐसी सामाजिक बंदिशों से मुक्त होता है। इसलिए वह सामान्यतः समाज में रहते हुए भी, समाज से डिस्कनेक्टेड होता है। कुछ लोग इससे अलग होते हैं, पर कुछ ही लोग, ज्यादा नहीं।

फिर भी लोग पूछ सकते हैं कि जब अधिकारी वर्ग सामान्यतः अपने समाज से जातिगत जुड़ाव महसूस नहीं करते तो फिर समाज में, शासन-प्रशासन में जातिवाद कैसे होता है? यह एक वाजिब प्रश्न हो सकता है। सच्चाई यह है कि जातिवाद होता है, बिल्कुल होता है पर उसका स्वरूप अलग है, उसकी दशा-दिशा अलग होती है। वैसा नहीं जैसा आम लोग समझते हैं। आप जातिगत आधार पर किसी बड़े व्यक्ति से फायदा और फेवर तभी ले सकते हैं जब आपकी और उनकी जाति एक होने के साथ-साथ, आपका और उनका क्लास भी एक हो। अगर क्लास समान न भी हो तो कम से कम थोड़ा-बहुत आगे-पीछे हो, या तो पद में, प्रतिष्ठा में, सामाजिक स्तर पर अथवा आर्थिक स्तर पर।

इसे ऐसे समझिए। किसी जिले के एसपी यदि भूमिहार हों या किसी राज्य के पुलिस मुखिया यदि भूमिहार हों तो उससे भूमिहार समाज के आम लोगों को रत्ती भर भी फायदा नहीं होने जा रहा। उस जाति के लोग उनके लिए चाहे कितना भी ढोल-नगाड़ा पीट लें या जातिगत जश्न मना ले। हां, फायदा हो सकता है पर सिमिलर क्लास वाले लोगों को। जैसे किसी बड़े भूमिहार ठेकेदार को, किसी बड़े भूमिहार पत्रकार को, बड़े भूमिहार बिजनेसमैन को, बड़े भूमिहार नेताओं को, भूमिहार वर्ग के ही अन्य अधिकारियों को चापलूसी करने पर या जी-हुजूरी करने पर फायदा और फेवर मिल सकता है, पर आम लोगों को नहीं।

कोई जरूरी नहीं कि फायदा और फेवर मिल ही जाए, क्योंकि यह अलग-अलग अधिकारियों के पर्सनल बिलिफ और कनविक्शन पर भी डिपेंड करता है, पर मैं यह कहना चाहता हूं कि यदि फायदा और फेवर मिलने की संभावना भी हो, तो भी ये बात तब बनेगी जब आपका कास्ट एक होने के साथ-साथ क्लास भी एक समान हो। इन फैक्ट, मैं तो कहता हूं कि क्लास, कास्ट से हजार गुना मजबूत होता है। अगर कास्ट सेम न भी हो, और क्लास सेम हो, तो भी सबकुछ संभव है।

ठीक इसी प्रकार यदि किसी राज्य के मुख्य सचिव या किसी बड़े राष्ट्रीय पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष कायस्थ हों तो इससे आम कायस्थों को कोई फायदा नहीं होने जा रहा, चाहे वह खुशी में कितना भी नाच लें। फायदा और फेवर अगर मिलना भी तो मिलेगा बड़े कायस्थ अधिकारियों को, बड़े कायस्थ बिजनेसमैन को, बड़े कायस्थ पत्रकार को, बड़े कायस्थ ठेकेदार को, बड़े कायस्थ राजनीतिज्ञों को और ऐसे ही सिमिलर क्लास वाले लोगों को। आम गरीब और मध्यमवर्गीय कायस्थ परिवार को कभी नहीं।

सबै सहायक सबल के कोउ न निबल सहाय।
पवन जगावत आग कौं दीपहि देत बुझाय॥

भीख समझकर या दयाभाव से आपकी जाति का कोई बड़ा आदमी कभी आपका कोई काम कर दे तो वो बात अलग है, जिसके लिए वो चाहेगा कि आप उसके अहसान तले जीवन भर दबे भी रहें, और आप खुद दबे हुए महसूस करेंगे, पर सामान्यतः आपको कोई फायदा और फेवर मिलेगा ही नहीं, जब तक कि आपका क्लास सेम नहीं हो। कास्ट सेम होने से कोई फर्क नहीं पड़ता है।

तो कुल मिलाजुलकर बात यह है कि सामान्यतः सारे सामाजिक रिलेशन “गिव और टेक” के होते हैं। कोई फायदा और फेवर आपको तभी देता है जब सामनेवाले के दिमाग में ये बात हो कि हमें भी कभी इनसे किसी रूप में जरूरत पड़ सकती है। बिहार के एक बहुत बड़े प्रतिष्ठित रिटायर्ड अधिकारी ने मुझसे एकबार कहा था, “रोहित, दो ही तरीके के लोगों की पैरवी सुनी जाती है। या तो पैरवीकार जिससे पैरवी कर रहा है, उसे वह फायदा पहुंचाने की स्थिति में हो, या किसी भी तरीके के नुकसान करने की स्थिति में। कभी कभार म्युचुअल रिस्पेक्ट के कारण भी सुन ली जाती है पर वह कम होता है।”

जब विनय बाबू को बिहार का डीजीपी बनाया गया, फिर बाद में कार्तिकेय शर्मा को पटना का एसएसपी बनाया गया, तो विपक्ष के लोगों ने, दूसरी जातियों के बड़े पत्रकारों ने तथा दूसरी जातियों के आम लोगों ने भी दबी जुबान से ही सही पर यह कहना प्रारम्भ किया कि शासन-प्रशासन में ऊपर से लेकर नीचे तक भूमिहार बैठे हुए हैं, उनको क्या दिक्कत? पर मैं समझता हूं कि पटना हॉस्टल कांड के बाद बहुत लोगों का कन्फ्यूजन क्लियर हुआ होगा कि व्यवस्था वैसे काम नहीं करती है जैसे आम लोग सोचते हैं। एसएसपी भूमिहार, डीजीपी भूमिहार पर फिर भी गरीब भूमिहार परिवार के एक लड़की को बिहार पुलिस से न्याय नहीं मिल पाया और राज्य सरकार को केस अंततः सीबीआई को सौंपना पड़ा। सनद रहे कि न्याय मिलना तो दूर की बात, पीड़ित परिवार को हर तरह से दबाने की कोशिश की गई, डराने-धमकाने की कोशिश की गई। सारे रिपोर्ट्स मीडिया में है, मैं उसे यहां रिपीट क्या करूं? एक आम भूमिहार की यही औकात है, ऊंचे पद पर चाहे कितने ही भूमिहार बैठे रहें। सबकी अपनी-अपनी राजनीति है, सबका अपना-अपना हीत है, सबका अपना-अपना स्वार्थ है।

एक व्यक्तिगत किस्सा बताता हूं। बताने की इच्छा नहीं है पर चूंकि बात खुल गई है तो मन मसोसकर बता देता हूं। कुछ महीने पूर्व मैने एक व्यक्तिगत काम हेतु बिहार के वर्तमान पुलिस महानिदेशक आदरणीय विनय बाबू से व्हाट्सएप के माध्यम से अपॉइंटमेंट मांगा। उन्होंने तुरंत रिस्पॉन्ड किया और अपॉइंटमेंट दे दिया। मैं उनसे मिलने उनके कार्यालय गया, करीब दो घंटे तक उनके साथ उनके चैंबर में बैठा रहा। इस दौरान कितने लोग आए और उनसे मिलकर गए। बीच-बीच में उन्होंने पूछा भी कि आप भी अपना काम बताइए, पर चूंकि मैं चाहता था कि सबलोग चले जाएं और उनका चैंबर खाली हो तो मैं अपनी बात रखूं, इस चक्कर में करीब दो घंटे तक उनके साथ उनके चैंबर में बैठा रह गया। मुझे यह जरूर स्वीकार करना चाहिए कि उन्होंने इस दौरान मुझे चाय भी पिलाई और बहुत आदरपूर्वक पेश आए, जो बहुत अच्छा लगा।

जब सबलोग चले गए, चैंबर खाली हो गया, तब मैने अपनी बात रखी। उन्होंने ध्यानपूर्वक सुना, अत्यंत शालीनता से पेश आए, पर मेरे रिक्वेस्ट पर वो शुरू में रिलक्टेंट दिखे। ऐसा नहीं था कि मेरा रिक्वेस्ट अनुचित था, बहुत ही उचित और जेन्युइन रिक्वेस्ट लेकर गया था उनके पास…….खैर।

उनके रिलक्टेंस को देखकर मैने अपना डिटेल्ड परिचय उन्हें दिया, पढ़ाई-लिखाई और अपने प्रोफेशनल अचीवमेंट्स के बारे में। अपनी एक किताब जिसमें मैं कॉन्ट्रिब्यूटर हूं, वह लेकर भी गया था उन्हें उपहार स्वरूप देने, उन्हें दिया भी, उन्होंने उलट-पलटकर देखा भी और फिर वो डिटेल्ड परिचय प्राप्त करने के बाद काफी प्रभावित हुए, यहां तक कह दिया कि, “भाई आपका प्रोफाइल बड़ा शानदार लग रहा है। आप बड़े जानकार आदमी लगते हैं।” मैने भी उत्साह में आकर एक बड़े भूमिहार नेता जिनसे वो करीब हैं, उनसे व्यक्तिगत संबंध होने का रेफरेंस भी दे दिया, यह सोचकर कि शायद काम हो जाए। मरता क्या न करता! हालांकि अंत में इशारों ही इशारों में दिए गए इस जातिगत रेफरेंस पर, जो संच कहूं तो वास्तविकता में मैं देना नहीं चाहता था क्योंकि एक तो कि वह मेरे स्वभाव के विपरीत है और दूसरी यह कि मैं जानता हूं कि बड़े लोग ऐसी बातों से अनकंफर्टेबल महसूस करते हैं; पर पता नहीं क्या सोचकर मजबूरीवश दे दिया, जिसपर उन्होंने थोड़ा-बहुत भी इंटरेस्ट नहीं लिया। और मुझे लगता है कि इंटरेस्ट न लेकर उन्होंने अच्छा ही किया।

पर इतना जरूर था कि मेरे प्रोफेशनल अचीवमेंट्स से वो प्रभावित दिखे, जिसके बाद उन्होंने मुझसे विषय से संबंधित एप्लीकेशन की मांग की, पर अगले दिन उन्होंने उसे अपने एक अधीनस्थ अधिकारी को फॉरवर्ड कर दिया, जिस पर आगे कोई कार्रवाई नहीं हुई। मैं दौड़ता रह गया और मेरा आवेदन धूल फांकता रह गया। विनय बाबू चाहते तो मेरे एप्लीकेशन को अपने अधीनस्थ अधिकारी को फॉरवर्ड करने के बजाए उसे खुद भी “एलाऊ” कर सकते थे, कोई बड़ी बात नहीं थी, विषय बहुत जेन्युइन था और उनके पास पूरी शक्ति भी थी मेरा काम कर देने की, पर उन्होंने नहीं किया।

इस बात को मैं एक शिकायत के तौर पर प्रस्तुत नहीं कर रहा हूं, अपने आप को व्यवस्था का पीड़ित भी नहीं दिखाना चाहता हूं, मैं अपना काम आज नहीं तो कल किसी न किसी तरह करवा ही लूंगा; मुझमें उतनी मेधा है जिससे मैं परिचित हूं, पर मैं सिर्फ यह कहना चाहता हूं कि जाति-जाति करनेवाले लोग धरातल की तथ्य और वास्तविकता को समझें कि कास्ट से कुछ नहीं होता है साहब, क्लास से होता है। विनय बाबू खराब व्यक्ति नहीं हैं, बहुत अच्छे, सज्जन और सुलझे हुए इंसान हैं, अत्यंत शालीन भी। मैं उनसे मिलकर बहुत प्रभावित हुआ। पटना एसएसपी कार्तिकेय शर्मा से भी एक बार उनके कार्यालय में मिला हूं। मुझे अच्छे व्यक्ति लगे, अत्यंत शालीनता से पेश आए। मैं उनसे भी प्रभावित हुआ।

मगर यहां बात किसी के अच्छे और खराब होने की नहीं है, प्रभावित-अप्रभावित होने की भी नहीं है, बात कास्ट और क्लास के अंतर की है। आमलोगों को यह समझना ज्यादा जरूरी है। यदि आप गरीब हैं, मध्यमवर्गीय सामान्य परिवार से हैं, कोई सॉलिड सोशल बैकग्राउंड नहीं है तो आपकी जाति, या आपकी जाति से जुड़े हुए बड़े पद पर बैठे हुए लोग आपके काम नहीं आयेंगे। पटना हॉस्टल कांड ने कम से कम इतना तो साबित कर ही दिया है। और यह सिर्फ भूमिहार जाति के विषय में नहीं है, कमोबेश हरेक जातियों के लिए यही अंतिम सत्य है। इसलिए यदि आप चाहते हैं कि आपको जीवन में कोई विशेष दिक्कत नहीं हो तो आपको अपना क्लास डेवलप करने पर ध्यान देना चाहिए, जातिगत झुनझुना बजाते रहने से कोई फायदा नहीं है। समय पर कोई काम नहीं आयेगा, सिवाय आपकी अपनी मेधा और अपने परिवार को छोड़कर। विषय पर सहमति अथवा किसी भी तरीके की तर्कसंगत असहमति आमंत्रित है।

“Mr. Rohit Kumar
Legal Advisor
Ambika Ujala”