जिला औरंगाबाद के गोह थाना में पदस्थापित पुलिस निरीक्षक सह थानाध्यक्ष प्रशांत कुमार सिंह आज केवल एक पुलिस अधिकारी के रूप में नहीं, बल्कि एक संवेदनशील समाजसेवी के रूप में भी पहचाने जा रहे हैं। नशाबंदी, नशा-मुक्ति और नशे के दुष्प्रभावों को लेकर उनके वक्तव्य औपचारिक पुलिस बयान भर नहीं होते, बल्कि वे एक जिम्मेदार नागरिक की पीड़ा और समाज के प्रति गहरी चिंता को अभिव्यक्त करते हैं। उनके शब्दों में यह स्पष्ट झलकता है कि उनका जनता से जुड़ाव केवल प्रशासनिक दायित्व तक सीमित नहीं है, बल्कि वे समाज के भटके हुए लोगों को सही दिशा में लौटाने के लिए सचेत और प्रतिबद्ध हैं।
इंस्पेक्टर प्रशांत कुमार सिंह का दृष्टिकोण दंड और भय पर आधारित नहीं, बल्कि जागरूकता, संवाद और सामाजिक सहभागिता पर केंद्रित है। उनका मानना है कि नशा एक सामाजिक बीमारी है, जिसे केवल पुलिसिया कार्रवाई से समाप्त नहीं किया जा सकता। इसके लिए समाज के हर वर्ग—बुद्धिजीवियों, अभिभावकों, शिक्षकों, युवाओं और जिम्मेदार नागरिकों—को एकजुट होकर भूमिका निभानी होगी। वे यह स्पष्ट रूप से स्वीकार करते हैं कि दूषित मानसिकता को बदलने के लिए समाज को स्वयं आगे आना होगा और पुलिस इसमें केवल मार्गदर्शक की भूमिका निभा सकती है।
उनकी यह सोच और प्रयास न केवल बिहार, बल्कि पूरे देश के लिए प्रेरणादायी हैं। बिहार पुलिस में यह एक दुर्लभ उदाहरण है, जहाँ कोई अधिकारी सोशल मीडिया जैसे मंच का उपयोग मानवीय और सुधारात्मक संदेश देने के लिए करता है। आमतौर पर पुलिस अधिकारियों की सोशल मीडिया सक्रियता को लेकर संकोच या औपचारिक सीमाएँ देखी जाती हैं, लेकिन उनके विचारपूर्ण पोस्ट और जनता की सकारात्मक प्रतिक्रियाएँ यह सिद्ध करती हैं कि समाज ऐसे ही संवेदनशील और जागरूक पुलिस अधिकारियों की अपेक्षा करता है।
इंस्पेक्टर प्रशांत कुमार सिंह के विचार यह विश्वास दिलाते हैं कि यदि कानून का पालन संवेदना, समझदारी और संवाद के साथ किया जाए, तो पुलिस और जनता के बीच की दूरी स्वतः समाप्त हो सकती है। नशामुक्त समाज की दिशा में उनका यह मानवीय प्रयास निश्चय ही आने वाली पीढ़ियों के लिए एक आदर्श बनेगा और समाज में सकारात्मक परिवर्तन की मजबूत नींव रखेगा।
