
बिहार के सुशासन के दावों को झटका देते हुए सहरसा जिले के नरियार क्षेत्र से एक चिंताजनक भ्रष्टाचार का मामला उजागर हुआ है। स्थानीय भू-उत्पीड़कों ने राजस्व विभाग के भ्रष्ट तत्वों के साथ मिलकर करीब 85 करोड़ 20 लाख रुपये कीमत वाली बहुमूल्य सरकारी और बकास्त भूमि पर अवैध कब्जे की चाल चली है। यह फर्जीवाड़ा प्रशासनिक तंत्र की कमजोरी को बेनकाब करता है, जहां स्थानीय मीडिया से लेकर अधिकारी तक चुप्पी साधे हुए हैं। नयाबाजार के निवासी प्रखर RTI कार्यकर्ता और सामाजिक योद्धा प्रणव कुमार ने इस सिलसिले को सामने लाकर जिला मजिस्ट्रेट को शिकायती आवेदन सौंपा है।
प्रणव कुमार के खुलासे के मुताबिक, कन्हैया द्विवेदी, रतन द्विवेदी, पवन द्विवेदी और रविकांत द्विवेदी जैसे प्रभावशाली भू-दलालों ने विभागीय कर्मियों की सांठ-गांठ से सरकारी संपदा को निजी संपत्ति में तब्दील करने का षड्यंत्र रचा है। उन्होंने नकली कागजातों की एक पूरी मशीनरी तैयार कर रखी है, जिसमें जाली दस्तावेज, फर्जी सर्वेक्षण और पुरानी हस्तलिखित रसीदें शामिल हैं। इनके जरिए बकास्त भूमि को रैयती दर्जा दिलाकर हड़प लिया जा रहा है। कार्यकर्ता ने नामों के साथ साक्ष्य प्रस्तुत कर कहा है कि ये तत्व वर्षों से कानूनी बंधनों को तोड़कर सरकारी धन को लूट रहे हैं, और विभाग के आंतरिक ‘सफेद कॉलर’ अपराधी इस खेल के सूत्रधार हैं।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि 2018 में अपर समाहर्ता न्यायालय ने इस भूमि की गलत जमाबंदी को रद्द करने का स्पष्ट आदेश जारी किया था। लेकिन जालसाजों ने अपील नंबर 16/2018 का सहारा लेकर अदालती फैसले को चुनौती दी है। जवाहर द्विवेदी और मणिकांत द्विवेदी के नाम पर अभिलेखागार में छेड़छाड़ कर 9 एकड़ से ज्यादा सरकारी प्लॉट का झूठा रिटर्न दर्ज कराया गया है। यह न केवल राजस्व की सीधी चोरी है, बल्कि सरकारी खजाने पर डाका भी। प्रणव कुमार ने चेताया है कि यदि तत्काल हस्तक्षेप न हुआ, तो ये अपराधी भूमि को बेचकर करोड़ों का लाभ उठा लेंगे।
शिकायत में जिलाधिकारी से मांग की गई है कि विवादित खाता-खेसरा नंबरों को फौरन ‘ब्लॉक लिस्ट’ में शुमार किया जाए, ताकि कोई अवैध लेन-देन न हो सके। अन्यथा, सरकारी संपत्ति की लूटपाट अनियंत्रित हो जाएगी। प्रणव ने इस पत्र की प्रतियां बिहार के उपमुख्यमंत्री, राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के उच्चाधिकारियों को भी प्रेषित की हैं। मामला गंभीर होने से प्रशासनिक हलकों में खलबली मच गई है, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। विशेषज्ञों का कहना है कि यह घटना भूमि सुधार नीतियों की पोल खोलती है, जहां भ्रष्टाचार ने सुशासन की नींव हिला दी है। यदि समय रहते जांच हुई, तो कई बड़े नाम उजागर हो सकते हैं। सहरसा के ग्रामीणों में आक्रोश फैल रहा है, और वे न्याय की मांग कर रहे हैं। अब प्रशासन की जवाबदेही पर सवाल उठ रहे हैं-क्या सरकारी जमीनें फिर से लुप्त हो जाएंगी, या कानून अपना रंग दिखाएगा ?